तुम खेल- खेल में पास आये
और जान पे मेरी खेल गये!
हँसाया फिर उतना ही रुलाया
क्यों इस विषाद में ठेल गये।
बड़े मन से थामा था मैंने,
आशाओं का आसमान तुम्हारा!
तंमय होकर सुना था हर दिन
मधुर रस भरा गान तुम्हारा!
अलग होकर भी कहाँ अलग थे
हर पीड़ा मिलजुल कर झेल गए!
कितने बसंत कितने पतझर
अनायास ही बीत गए!
क्या भूल हुई भारी मुझसे
जो बदल यूँ तुम मनमीत गये
मुँह मोड़ अचानक चले गए
कहाँ वो मन के मेल गए! !
बड़े जतन से मैंने तुम्हें
एक नेह डोर में बाँधा था!
जब सर रखकर रोना चाहा
पाया वो पराया कांधा था!
सब सुख ले खुद के साथ चले
बो प्राणों में विरह की बेल गए!!