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सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

वो घड़ी बीत गयी

 

 

घड़ी  बीत गयी प्रिये
जिसका भीतर बड़ा भय था
सूख गया अनायास फिर
जो सुखद प्रेम किसलय था!

छद्म स्नेह की लीपापोती
थी प्रवंचक  मुखड़ों पर
कब किसकी दृष्टि पहुँच सकी
टूटे सपनों के टुकड़ों पर!
हृदयहीनता से अपनों की
विदीर्ण हुआ हृदय था!

कोई थपकी स्नेह भरी न दे पाई,
धीरज व्याकुल मन को,
हँसी खुशी के अविरल नाद
रोक सके न  भीषण कम्पन को
दावानल -सा धधकता ये
कैसा निर्मम समय था¡

रुँधे कंठ में फंसे रहे स्वर
ना अधरों तक न पहुँच सके
हंसना चाहा हँस न पाए
ना सबके आगे सिसक सके!